भक्त का निश्चय , कबीर दास जी की कथा

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एक बार कबीरजी ने साहूकार से ब्याज पर सौ रूपये लिए और वे सौ रुपयों को साधू संतों पर खर्च कर दिया। और साहूकार से बोला कुछ महीने बाद ब्याज समेत पैसे वापिस करूंगा।

महीने निकल गए। वह साहूकार भी बड़ा लालची था उसने काजी की कचहरी में अर्जी दे दी और डिगरी करवाकर ब्याज लगा लिया। कबीर जी के एक भक्त ने आकर बताया तो वह काफी नाराज हो गए।

उन्होंने अपनी पत्नी लोई जी से कहा कि घर का सारा सामान पड़ौसियों के यहाँ पर रख दो। जिससे साहूकार उनको उस समान को ब्याज के लिए ना ले जा सके।

और मैं चार दिन इधर-उधर चला जाता हूँ जब रूपये होगें तो साहूकार को देकर उससे देरी के लिए क्षमा माँग लूँगा।

लोई जी ने कहा: स्वामी ! मुझे निश्चय है कि रामजी अपने भक्त की कभी ब्याज नहीं होने देंगे। आपको कहीं पर भी जाने की जरूरत नहीं है।

कबीरजी उनकी पत्नी का निश्चय देखा, फिर भी कहा लोई, फिर भी मुझे कुछ दिन कहीं पर बिताने चाहिए।

लोई जी: स्वामी जी ! इसकी कोई जरूरत नहीं है। इस काम को रामजी आप ही सवारेंगे। लोई जी ने निश्चय के साथ कहा।

कबीर जी मुस्कराकर बोले: प्यारी लोई ! यही तो तेरा गुरू रूप है।

लोई जी ने कहा: स्वामी जी ! गुरू बोलकर मेरे सिर पर भार ना चढ़ाओ।

कबीर जी: लोई जी ! इसमें भला सिर पर भार चढ़ाने वाली कौनसी बात है। जो उपदेश दे, उसको गुरू मानना ही चाहिए।

कबीर जी अपनी पत्नी के साथ बात करने में इतने मग्न हो गये कि उन्हें साहूकार और ब्याज वाली बात ही भूल गई। रात हो गई परन्तु साहूकार नहीं आया।

सोने से पहले कबीर जी ने फिर कहा: लोई ! ऐसा लगता है कि साहूकार सुबह लोगों लेकर वसूली करने आएगा।

लोई जी ने दृढ़ता के साथ कहा: स्वामी जी ! जी नहीं, बिल्कुल नहीं, कोई ब्याज नहीं वसूला जाएंगा। परमात्मा जी उसे हमारे घर पर आने ही नहीं देंगे।

कबीर जी: लोई ! तुने मेरे रामजी से कुछ ज्यादा ही काम लेना शुरू कर दिया है।

लोई जी: स्वामी ! जब हम राम के हो गए हैं तो हमारे काम वो नहीं करेगा तो कौन करेगा ?

तभी अचानक किसी ने दरवाजा खटखटाया। लोई जी ने उठकर दरवाजा खोला तो सामने साहूकार का साहूकार का भेजा व्यक्ति खड़ा था।

लोई जी ने उस व्यक्ति से पूछा: क्यों राम जी के भक्त ! हमसे ब्याज वसूलने आए हो ?

व्यक्ति ने नम्रता से कहा: नहीं जी, माता जी ! आपसे ब्याज वसूलने अब कोई नही आयेगा।

क्योंकि जब हम कल ब्याज वसूलने आ रहे थे। वहाँ  पर एक सुन्दर मुखड़े वाला और रेश्मी वस्त्र धारण करने वाला सेठ आया हुआ था।

उसने हमसे पूछा कि आपको कितने रूपये कबीर जी से लेने हैं। साहूकार ने कहा कि 100 रूपये और ब्याज के 30 रूपये।

उस सन्दुर मुखड़े वाले सेठ ने एक थैली साहूकार के हात में रख दी, और कहां कि इसमें पाँच सौ रूपये हैं। यह कबीर जी के हैं और हमारे पास सालों से रखे हुए है।

जितने तुम्हारे हैं आप ले लो और बाकी के कबीर जी के घर पर दे दीजिए।

साहूकार जी उनसे और बातचीत करना चाह रहे थे, परन्तु वह पता नहीं एकदम से कहाँ चले गये जैसे लुप्त ही हो गए।

यह देखकर साहूकार पर बहुत प्रभाव पड़ा। वह समझ गया कि कबीर जी कोई ईश्वर के बंदे हैं और वह उनकी ब्याज करके गुनाह के भागी बनने जा रहे थे।

साहूकार जी ने यह थैली आपके पास भेजी है, इसमें पूरे पाँच सौ रूपये हैं।

साहूकार जी ने कहा है कि कबीर जी उनके रूपये भी धर्म के काम में लगा दें और उनका यह पाप क्षमा कर दें।

लोई जी ने कबीर जी से कहा: स्वामी ! राम जी की भेजी हुई यह माया की थैली अन्दर उठाकर रखो।

कबीर जी मुस्कराकर बोले: कि लोई जी ! इस बार रामजी ने तेरे निश्चय अनुसार कार्य किया है। इसलिए थैली तुझे ही लेनी होंगी।

लोई जी: कि नहीं स्वामी ! रामजी हमारे दोनों के हैं। इसलिए दोनों मिलकर उठाएंगे।

दोनों पति-पत्नी अपने रामजी का गुणगान करते हुये थैली उठाकर अन्दर ले गए।

उसी दिन कबीर जी के घर पर एक बहुत बड़ा भण्डारा हुआ। जिसमें कबीर जी ने वह सारी रकम खर्च कर दी गई।

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